ग़ज़ल: नहीं हूँ मैं अब गम उठाने के काबिल
📅 22-10-2024 01:40 AM
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कविता
<p>गुनाहों से खुद को बचाने के काबिलखुदाया बना सर झुकाने के काबिल</p>
<p>मेरी मुफ्लिसि मेरे पीछे पड़ी हैबना इससे पीछा छुड़ाने के काबिल</p>
<p>इलाही ये अब तो मेरी तंगदस्तिबची ही नहीं आजमाने के काबिल</p>
<p>कोई दाग़ आये ना दामन पे मेरेहमेशा रहूँ सर उठाने के काबिल</p>
<p>तेरी रहमतों का सहारा है वरनाकहाँ हूँ मैं इतना कमाने के काबिल</p>
<p>दो आलम के खालिक मेरी लाज़ रख लेनहीं हूँ मैं अब गम उठाने के काबिल</p>
<p>मेरी दिल की दुनियाँ है तारीक रौशनबचा कुछ नहीं है जलाने के काबिल</p>
<p>अफरोज रौशन किछौछवी</p>
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