कविता: जोंक
📅 10-04-2022 08:27 AM
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कविता
<p>रोपनी जब करते हैं कर्षित किसान ;तब रक्त चूसते हैं जोंक!चूहे फसल नहीं चरतेफसल चरते हैंसाँड और नीलगाय…..चूहे तो बस संग्रह करते हैंगहरे गोदामीय बिल में!टिड्डे पत्तियों के साथपुरुषार्थ को चाट जाते हैंआपस में युद्ध करकाले कौए मक्का बाजरा बांट खाते हैं!प्यासी धूपपसीना पीती है खेत मेंजोंक की भाँति!अंत में अक्सर हीकर्ज के कच्चे खट्टे कायफल दिख जाते हैंसिवान के हरे पेड़ पर लटके हुए!इसे ही कभी कभी ढोता है एक किसानसड़क से संसद तक की अपनी उड़ान में!</p>
<p>कवि: गोलेन्द्र पटेलजन्मस्थान : खजूरगाँव, साहुपुरी, चंदौली, उत्तर प्रदेश</p>
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